भगवान विष्णु के कुछ ऐसे अवतार जो सर्वविदित नहीं है


गीता में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने कहा है कि वह हमेशा अपना धर्म निभाने के लिए अलग-अलग अवतार लेते हैं। भगवान विष्णु के दशावतारों के बारे में तो सभी जानते हैं लेकिन भगवान इसके अलावा भी कई रूपों में अवतरित हुए हैं। 

सनकदि:

माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।

नर-नारायण:

विष्णु ने भगवान ब्रह्मा के पुत्र धर्म के घर इस रूप में जन्म लिया। इस अवतार में वे अपने मस्तक पर जटा धारण किए हुए थे। उनके हाथों में हंस, चरणों में चक्र एवं छाती पर श्रीवत्स के चिन्ह थे। उनका संपूर्ण वेष तपस्वियों के समान था। महाभारत में कृष्ण और अर्जुन को नर-नारायण का अवतार बताया गया है।

नारद मुनि:

धर्म ग्रंथों के अनुसार देवर्षि नारद भी विष्णु का ही अवतार हैं। शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है कि देवर्षियों में मैं नारद हूं।

कपिल:

विष्णु ने कपिल मुनि के रूप में भी अवतार लिया। इनके पिता का नाम महर्षि कश्यप व माता का नाम देवहूति था। कपिल मुनि के क्रोध से ही राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए थे। भगवान कपिल सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं। कपिल मुनि भागवत धर्म के प्रमुख बारह आचार्यों में से एक हैं। वे सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं।

दत्तात्रेय:

एक बार त्रिदेव ब्रहा, विष्णु और महेश ने ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के पतिव्रत धर्म से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि वे अपने अंश से उनके गर्भ से पुत्ररूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

पृथु:

भगवान विष्णु के एक अवतार पृथु भी हैं। मनु के वंश में वेन नाम के राजा ने भगवान को मानने से इंकार कर दिया और स्वयं की पूजा करने के लिए कहा। तब महर्षियों ने उसका वध कर दिया। वंश आगे बढ़ाने के लिए राजा की भुजाओं के मंथन से पृथु नाम पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथु के दाहिने हाथ में चक्र और चरणों में कमल का चिह्न देखकर ऋषि समझ गए यह भदवान श्रीहरि का अंश है।

धन्वन्तरि:

समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उनहें भी भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। इन्हें औषधियों का स्वामी भी माना गया है।

मोहिनी:

अमृत को लेकर असुरों व देवताओं में मार-काट मच गई थी। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर सबको मोहित कर दिया किया। मोहिनी ने कहा कि वह बारी-बारी से देवताओं और असुरों दोनों को अमृत पिला देंगी। वास्तविकता में मोहिनी ने सिर्फ देवताओं को ही अमृत पिलाया जबकि असुर समझते रहे कि वे भी अमृत पी रहे हैं। इस प्रकार भगवान ने मोहिनी अवतार लेकर देवताओं का भला किया।

गजेन्द्रोधारावतर:

कहा जाता है कि तालाब में रहने वाले एक मगरमच्छ ने पानी पीने आए एक हाथी का पैर पकड़ लिया और पानी के अंदर खींचने लगा। गजेंद्र और मगरमच्छ का संघर्ष एक हजार साल तक चलता रहा। अंत में गजेंद्र ने भगवान का ध्यान किया। उसकी स्तुति सुनकर भगवान प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया।

वेदव्यास:

पुराणों में महर्षि वेदव्यास को भी भगवान विष्णु का ही अंश माना गया है। भगवान व्यास नारायण के कलावतार थे। इन्होंने ही मनुष्यों की आयु और शक्ति को देखते हुए वेदों के विभाग किए इसलिए इन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है। इन्होंने ही महाभारत ग्रंथ की रचना भी की।

हयग्रीव:

धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली वेदों को चोरी कर पाताल में पहुंच गए। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के जैसी थी। भगवान हयग्रीव ने मधु-कैटभ का वध कर वेद भगवान ब्रह्मा को लौटा दिए।

हंसावतार:

एक बार भगवान ब्रह्मा अपनी सभा की सभा में उनके मानस पुत्र सनकादि पहुंचे और भगवान ब्रह्मा से मनुष्यों के मोक्ष के संबंध में चर्चा करने लगे। तभी वहां भगवान विष्णु हंस के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सनकादि मुनियों के संदेह का निवारण किया।