भक्ति का बीजारोपण


एक समय ठाणे के श्रीकौपीनेश्वर मंदिर में श्री दासगणू कीर्तन और श्री साईबाबा का गुणगान कर रहे थे. श्रोताओं में एक चोलकर नामक व्यक्ति, जो ठाणे के दीवानी न्यायालय में एक अस्थायी कर्मचारी था, भी वहां उपस्थित था. दासगणू का कीर्तन सुनकर वह बहुत प्रभावित हुआ और मन ही मन बाबा को नमन कर प्रार्थना करने लगा कि हे बाबा, मैं एक निर्धन व्यक्ति हूं और अपने कुटुम्ब का भरण-पोषण भी भली भांति करने में असमर्थ हूं. यदि मैं आपकी कृपा से विभागीय परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया तो आपके श्री चरणों में उपस्थित होकर आपके निमित्त मिश्री का प्रसाद बांटूंगा. भाग्य ने पल्टा खाया और चोलकर परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया. उसकी नौकरी भी स्थायी हो गई. अब केवल संकल्प ही शेष रहा. शुभस्य शीघ्रम. श्री चोलकर निर्धन तो था ही और उसका कुटुम्ब भी बड़ा था. अतः वह शिरडी यात्रा के लिए मार्ग-व्यय जुटाने में असमर्थ हुआ. ठाणे ज़िले में एक कहावत प्रचलित है कि नाठे घाट व सहाद्रि पर्वत श्रेणियां कोई भी सरलतापूर्वक पार कर सकता है, परंतु ग़रीब को उंबर घाट (गृह-चक्कर) पार करना बड़ा ही कठिन होता है.

श्री चोलकर अपना संकल्प शीघ्रातिशीघ्र पूरा करने के लिए उत्सुक था. उसने मितव्ययी बनकर, अपना खर्च घटाकर पैसा बचाने का निश्चय किया. इस कारण उसने बिना शक्कर की चाय पीना प्रारंभ किया और इस तरह कुछ द्रव्य एकत्रित कर वह शिरडी पहुंचा. उसने बाबा का दर्शन कर उनके चरणों पर गिरकर नारियल भेंट किया तथा अपने संकल्पानुसार श्रद्धा से मिश्री वितरित की और बाबा से बोला कि आपके दर्शन से मेरे हृदय को अत्यंत प्रसन्नता हुई है. मेरी समस्त इच्छाएं तो आपकी कृपादृष्टि से उसी दिन पूर्ण हो चुकी थीं. मस्जिद में श्री चोलकर का आतिथ्य करने वाले श्री बापूसाहेब जोग भी वहीं उपस्थित थे. जब वे दोनों वहां से जाने लगे तो बाबा जोग से इस प्रकार कहने लगे कि अपने अतिथि को चाय के प्याले अच्छी तरह शक्कर मिलाकर देना. इन अर्थपूर्ण शब्दों को सुनकर श्री चोलकर का हृदय भर आया और उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. उनके नेत्रों से अश्रु धाराएं प्रवाहित होने लगीं और वे प्रेम से विहृल होकर श्रीचरणों पर गिर पड़े. श्री जोग को अधिक शक्कर सहित चाय के प्याले अतिथि को दो, यह विचित्र आज्ञा सुनकर बड़ा कोतूहल हो रहा था कि यथार्थ में इसका अर्थ क्या है.

बाबा का उद्देश्य तो श्री चोलकर के हृदय में केवल भक्ति का बीजारोपण करना ही था. बाबा ने उन्हें संकेत किया था कि वे शक्कर छोड़ने के गुप्त निश्चय से भली भांति परिचित हैं. बाबा का यह कथन था कि यदि तुम श्रद्धापूर्वक मेरे सामने हाथ फैलाओगे तो मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूंगा. यद्यपि मैं शरीर से तो यहां हूं, परंतु मुझे सात समुद्रों के पार भी घटित होने वाली घटनाओं का ज्ञान है. मैं तुम्हारे हृदय में विराजीत, तुम्हारे अंतरस्थ ही हूं. जिसका तुम्हारे तथा समस्त प्राणियों के हृदय में वास है, उसकी ही पूजा करो. धन्य और सौभाग्यशाली वही है, जो मेरे सर्वव्यापी स्वरूप से परिचित है. बाबा ने श्री चोलकर को कितनी सुंदर तथा महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान की.